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Thursday, April 8, 2010

आशा पारेखःआंखों में मस्ती शराब की

हिंदी सिनेमा में चुलबुली नायिकाओं की तादाद अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। पुराने दौर की ऎसी हीरोइनों की बात चले, तो गीता बाली के साथ जेहन में आशा पारेख का नाम उभरता है। अहम बात यह है कि अपने फिल्मी कॅरियर की आधी सदी पूरा कर चुकी आशा पारेख आज भी सक्रिय हैं, जबकि उनकी पीढी की लगभग सभी नायिकाएं नंदा, माला सिन्हा, सायरा बानो, साधना-गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गई हैं। इस मामले में आशा पारेख की तुलना 'फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन' देविका रानी से की जा सकती है, जो रिटायर होने के पचास साल बाद तक लाइम-लाइट में बनी रही।
अपनी मां की मौत के बाद आशा पारेख के जीवन में जो खालीपन आ गया था, उसे समाज सेवा और फिल्म इंडस्ट्री के कामगारों के हक में लडाई लडकर भरा है। उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल का पूरा विंग गोद ले रखा है, जहां नियमित जाकर मरीजों की मदद करती है। सिंटा यानी सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की वे छह साल तक अध्यक्ष रही और कामगारों के कल्याण के लिए अनेक काम किए। फिल्म सेंसर बोर्ड की चेयर परसन बनने वाली वे पहली महिला हैं। उनके कार्यकाल में फिल्मों से हिंसा और अश्लीलता के अनेक सीन काट दिए गए अथवा ऎसी फिल्मों को प्रमाण-पत्र देने से इनकार कर दिया गया। इसका सबसे बडा उदाहरण है शेखर कपूर की फिल्म 'बेंडिट क्वीन'। इसे लेकर शेखर और पारेख में मीडिया में गरमागरम बयानबाजी महीनों तक चली थी।
महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिन दो अक्टूबर (1942) को जन्मी आशा पारेख को घर पर कुछ अलग ही माहौल मिला। मां सुधा सामाजिक कार्यकर्ता थीं। बचपन से आशा को डांस का शौक था। पडोस के घर में संगीत बजता, तो आशा के पैर थिरकने लग जाते थे। यह देख मां ने कथक नर्तक मोहनलाल पांडे से उसे बाकायदा प्रशिक्षित कराया। बाद में गोपीकृष्ण और पं. बिरजू महाराज से आशा ने भरतनाट्यम सीखा। अपनी कला को अपने तक सीमित न रखते उन्होंने वैजयंतीमाला और हेमामालिनी की तरह नृत्य-नाटिकाएं- 'चौला देवी' 'अनारकली' और 'इमेज ऑफ इंडिया' तैयार कर पूरी दुनिया में स्टेज शो दिए। आशा को इस बात का गर्व है कि उन्होंने हिंदुस्तान की ओर से न्यूयॉर्क के लिंकन थिएटर में पहली बार प्रस्तुति दी थी।
स्कूल के एक कार्यक्रम में उनकी परफॉमेंस देखकर फिल्मकार विमल राय ने फिल्म 'बाप-बेटी' में आशा को एक छोटा रोल दिया था। लेकिन फिल्मकार विजय भट्ट ने अपनी फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' में यह कह कर मना कर दिया कि आशा में 'स्टार मैटेरियल' नहीं है। आशा के जीवन में नासिर हुसैन गॉड फादर की तरह आए। वे शशधर मुखर्जी के लिए फिल्म 'दिल देके देखो' के लिए नए चेहरे की तलाश में थे। 1959 में आशा के सत्रहवें जन्मदिन पर यह फिल्म उपहार बनकर आई और वे स्टार हीरोइन बन गईं। इस फिल्म से लेकर 'कारवां' (1971) तक आशा का कॅरियर जगमग रहा। उनकी ज्यादातर फिल्मों ने सिल्वर या गोल्डन जुबली मनाई। बॉलीवुड की नायिकाओं में आशा पारेख की इमेज हमेशा 'टॉम ब्वॉयज' की रही है, इसलिए नायकों ने कभी आशा पर लाइन मारने की कोशिश नहीं की। यही वजह है कि उनके बारे में मीडिया में कभी गॉसिप या स्कैंडल नहीं छपे। शम्मी कपूर जैसे दिलफेंक हीरो को वे शुरू से अब तक चाचा कहती रही हैं। आशा का साथ पाकर उनके नायक सफल रहे, पर उनकी समकालीन तारिकाओं-शर्मिला टैगोर, साधना, नूतन, माला सिन्हा और नंदा को बॉक्स ऑफिस पर उनके समान कामयाबी नसीब नहीं हुई।
आशा पारेख की ट्रेजेडी यह है कि नटखट तारिका मान लेने से उनकी छवि संजीदा अभिनेत्री की नहीं बन पाई। शक्ति सामंत की फिल्म 'कटी पतंग' में उन्होंने ग्लैमरहीन विधवा का रोल किया था, जिसे समीक्षकों ने काफी सराहा। राज खोसला निर्देशित 'दो बदन', 'चिराग' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की, फिल्मों में आशा पारेख को सीरियसली लिया गया। साठ के दशक के बाद नई हीरोइनों के आ जाने और अपनी उम्र बढ जाने से वे कैरेक्टर रोल करने लगीं।
फिल्मों से दूर होकर आशा ने टीवी सीरियल बनाकर छोटे परदे पर भी सफलता पाई। 'कोरा कागज' और 'कंगन' उनके यादगार धारावाहिक हैं। आशा ने शादी नहीं की और उन्हें इस बात का का अफसोस नहीं है। समाज सेवा के जरिए वे सुखी और संतुष्ट नजर आती हैं। वहीदा रहमान-नंदा और आशा- ये तीनों सहेलियां मुंबई के फिल्म सर्किल में मशहूर हैं। अपने प्रशंसकों के बीच आशा पारेख के आज भी पॉपुलर बने रहने में उनकी फिल्मों के फडकते-धडकते मधुर संगीत की अहम भागीदारी रही है। सिनेमा में पचास साल पूरे करने पर पिछले साल गोवा के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उनका सम्मान किया गया था।
(श्रीराम ताम्रकर,राजस्थान पत्रिका,27 मार्च,2010)

1 comment:

  1. आशाजी के चेहरे में जो ताजगी थी और आँखों में जो शोखी थी, ये दोनों एक साथ बहुत कम अदाकाराओं में देखने को मिली है. उनकी आवाज तो जैसे दर्शकों को खींच लेती थी अपनी तरफ. काश बीता हुआ वक्त लौट आये औए आशाजी फिर उसी तरह से फिल्मों में आ जाए!! आशाजी ; आपको और आपकी फिल्मो को भुलाना नामुमकिन है.

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